बेहद तन्हा हूँ मैं, बस खुद से खुद की बातें करता हूँ,
ये जिंदगी की कई कहानियाँ, जो मैं खुद ही सुनता हूँ।
अब तो जीने का मन नहीं, कितनी बार यही सोचता हूँ,
खुद से जुदा होने का दर्द, जो मैं हर रोज़ झेलता हूँ।
जब से वो चली गई, छोड़ कर मेरे दिल को तन्हाई में,
हर पल उसकी ख्यालात, जो मैं दिल में बसाता हूँ।
रातों की तन्हाई में, जब अकेला हो जाता हूँ,
खुद से पूछता हूँ मैं, क्यों ये दर्द सहता हूँ।
वक़्त के साथ चलते चलते, मैं खुद को खो बैठा हूँ,
जीने का मक़सद खो दिया, अब तो बस जीता हूँ।
ख्वाबों में बस वो ही है, यादों में वो ही है,
कैसे भुला सकता हूँ,
उसकी मिठी बातों को मैं।
जब से वो गई, छोड़ कर मेरे दिल को तन्हाई में,
हर पल उसकी यादों का जादू, जो मैं दिल में बसाता हूँ।
अब किसी की मोहब्बत में, फिर से नहीं जी पाता हूँ,
खुद को बेचकर बस खोता, अब तो सिर्फ रोता हूँ।
बीते पलों की यादों में, खोकर खुद को मैं तन्हाई में,
खोया हुआ वक़्त लौटाता हूँ, जो मैं दिल में बसाता हूँ।